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Theory of Supply in Perfect Competition |BSEH| 12 Micro Chapter 11

class 12 micro economics notes in hindi medium haryana board

अध्याय-11 प्रतियोगिता में पूर्ति का सिद्धांत
(Chapter 11-Theory of Supply in Perfect Competition)

BSEH/HBSE class 12 micro economics chapter 11-Theory of Supply in Perfect Competition notes in Hindi medium.

पूर्ति की धारणा (Concept of Supply)

किसी वस्तु की पूर्ति से अभिप्राय वस्तु की उन मात्राओं से है जिन्हें एक विक्रेता विभिन्न संभव कीमतों पर निश्चित समय में बेचने के लिए तैयार होता है।

परिभाषा

थॉमस के अनुसार, वस्तु की पूर्ति वह मात्रा है जो एक बाजार में किसी निश्चित समय पर विभिन्न कीमतों पर बिकने के लिए प्रस्तुत की जाती है

पूर्ति तथा स्टॉक में अंतर (Distinction between Stock and Supply)

आम बोलचाल की भाषा में पूर्ति तथा स्टॉक शब्द का प्रयोग एक ही अर्थों में किया जाता है। परंतु अर्थशास्त्र में इन शब्दों के विभिन्न अर्थ होते हैं।

किसी वस्तु का स्टॉक वस्तु की उस कुल मात्रा को बतलाता है जो किसी समय में बाजार में विक्रेता के पास मौजूद होती है, जबकि पूर्ति स्टॉक का वह भाग है जो कि विक्रेता एक निश्चित समय अवधि में तथा निश्चित कीमत पर बेचने के लिए तैयार होता है।

उदाहरण के लिए मान लीजिए एक विक्रेता के पास जनवरी 2022 में गेहूं का स्टॉक 100 टन है तथा कीमत ₹1500 प्रति क्विंटल है। इस कीमत पर विक्रेता केवल 20 टन गेहूं बेचने के लिए तैयार होता है तो गेहूं की पूर्ति मात्र 20 टन ही कहलाएगी। यदि कीमत बढ़कर ₹1700 प्रति क्विंटल हो जाती है तो विक्रेता इस कीमत पर 50 टन गेहूं बेचने के लिए तैयार होता है तो गेहूं की पूर्ति 50 टन होगी।

किसी वस्तु की पूर्ति तथा पूर्ति की मात्रा में अंतर

जिस तरह से मांग तथा मांगी गई मात्रा में अंतर होता है उसी प्रकार पूर्ति तथा पूर्ति की मात्रा में भी अंतर होता है।

पूर्ति की मात्रा (Quantity of Supply)

पूर्ति की मात्रा से अभिप्राय किसी वस्तु के उस विशेष मात्रा से हैं जो एक निश्चित समय में एक निश्चित कीमत पर बिक्री के लिए प्रस्तुत की जाती है।

एनातोल मुराद के अनुसार, किसी वस्तु की पूर्ति की मात्रा से अभिप्राय किसी वस्तु की उस मात्रा से है जिसे उस वस्तु का विक्रेता एक निश्चित कीमत पर एक निश्चित बाजार में निश्चित समय पर बेचने के लिए तैयार है।

पूर्ति (Supply)

इसके विपरीत पूर्ति से अभिप्राय किसी वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं से हैं जो एक निश्चित समय में विभिन्न कीमतों पर बिक्री के लिए प्रस्तुत की जाती है

पार्किंग के अनुसार, पूर्ति की धारणा से अभिप्राय किसी वस्तु की कीमत तथा आपूर्ति की जाने वाली मात्रा में पाए जाने वाले कुल संबंध से है।

व्यक्तिगत पूर्ति तथा बाजार पूर्ति (Individual Supply and Market Supply)

व्यक्तिगत पूर्ति से अभिप्राय किसी वस्तु की एक विक्रेता द्वारा बाजार में की गई पूर्ति। इसके विपरीत बाजार पूर्ति से अभिप्राय है किसी वस्तु के बाजार में सभी विक्रेताओं द्वारा की गई पूर्ति जो उस वस्तु का उत्पादन या बिक्री करते हैं।

उदाहरण के लिए मान लीजिए बाजार में किसी वस्तु के केवल 2 विक्रेता फर्म A और फर्म B है। किसी निश्चित कीमत पर फर्म A एक वस्तु की 100 इकाइयों की पूर्ति करती है तथा फर्म B 200 इकाइयों की पूर्ति करती है तो बाजार पूर्ति या उद्योग पूर्ति 300 इकाइयां होंगी।

व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची (Individual Supply Schedule)

व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची/तालिका से अभिप्राय बाजार में किसी एक फर्म या एक विक्रेता की पूर्ति अनुसूची से है। व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची एक फर्म द्वारा विभिन्न कीमतों पर की जाने वाली विभिन्न पूर्ति को प्रकट करती है।

इसे निम्न तालिका द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

आइसक्रीम की कीमतमात्रा
50
1010
1520
2030

तालिका से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की कीमत बढ़ रही है उसकी पूर्ति भी बढ़ रही है। जब आइसक्रीम की कीमत ₹5 प्रति इकाई होती है तो उत्पादक आइसक्रीम की कोई भी मात्रा बेचने के लिए तैयार नहीं होता। कीमत के बढ़कर ₹10 प्रति आइसक्रीम होने पर पूर्ति 10 इकाइयां हो जाती है। इसी प्रकार कीमत के बढ़ते जाने पर पूर्ति भी बढ़ती जाती है। अतएव व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची वह अनुसूची है जो अन्य बातें समान रहने पर, एक फर्म द्वारा किसी वस्तु की कीमत तथा बेची जाने वाली मात्रा के संबंध को प्रकट करती है।

बाजार पूर्ति अनुसूची (Market Supply Schedule)

बाजार पूर्ति अनुसूची से अभिप्राय बाजार में किसी विशेष वस्तुओं का उत्पादन की आपूर्ति करने वाली सभी फ़र्मों की पूर्ति की मात्रा के जोड़ से है। किसी वस्तु का उत्पादन करने वाले सभी फ़र्मों के समूह को उद्योग कहते हैं। अतएव बाजार पूर्ति अनुसूची, समस्त उद्योग की पूर्ति अनुसूची होती है।

इसे निम्न तालिका से स्पष्ट किया जा सकता है-

आइसक्रीम की कीमतफर्म A द्वारा की गई पूर्तिफर्म B द्वारा की गई पूर्तिबाजार पूर्ति (A+B की पूर्ति)
5000
1010510+5=15
15201020+10=30
20301530+15=45

तालिका से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे कीमत बढ़ती जाती है, बाजार पूर्ति बढ़ती जाती है। जब आईसक्रीम की कीमत ₹5 प्रति इकाई होती है तब कोई भी फर्म आइसक्रीम की पूर्ति नहीं करती है। कीमत के बढ़कर ₹10 प्रति आइसक्रीम हो जाने पर फर्म A 10 इकाई तथा फर्म B 5 इकाइयों की पूर्ति करती है। अतः बाजार पूर्ति 15 इकाई हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि अन्य बातें समान रहने पर बाजार पूर्ति तालिका किसी वस्तु की कीमत तथा बेची जाने वाली मात्रा के संबंध को प्रकट करती है।

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पूर्ति वक्र (Supply Curve)

पूर्ति अनुसूची या तालिका का रेखीय प्रस्तुतीकरण पूर्ति वक्र कहलाता है। इसके द्वारा किसी वस्तु की कीमत तथा पूर्ति की मात्रा में धनात्मक संबंध प्रकट होता है।

पूर्ति अनुसूची की तरह पूर्ति वक्र भी दो प्रकार का होता है

  1. व्यक्तिगत पूर्ति वक्र
  2. बाजार पूर्ति वक्र

1- व्यक्तिगत पूर्ति वक्र (Individual Supply Curve)

व्यक्तिगत पूर्ति वक्र, बाजार में एक फर्म या एक विक्रेता की पूर्ति अनुसूची का रेखाचित्रीय या ग्राफिक प्रस्तुतीकरण है। इस वक्र के नीचे से ऊपर के ढलान से ज्ञात होता है कि वस्तु की कीमत तथा उसकी पूर्ति में धनात्मक संबंध है। इसे निम्न रेखाचित्र से स्पष्ट किया जा सकता है-

रेखाचित्र में OX अक्ष पर वस्तु की मात्रा तथा OY अक्ष पर कीमत को दर्शाया गया है। SS पूर्ति वक्र है तथा इसका ढलान धनात्मक है। इससे ज्ञात होता है कि कीमत के बढ़ने पर पूर्ति बढ़ती है। रेखाचित्र से यह भी ज्ञात होता है कि जब कीमत ₹5 या इससे कम होगी तो कोई भी तो विक्रेता वस्तु बेचने के लिए तैयार नहीं होता है। जिस कीमत के नीचे विक्रेता वस्तु को बेचने के लिए तैयार नहीं होता उसे सुरक्षित कीमत अथवा न्यूनतम पूर्ति कीमत कहते हैं।

2- बाजार पूर्ति वक्र (Market Supply Curve)

बाजार पूर्ति वक्र, बाजार पूर्ति अनुसूची का ग्राफिक या रेखाचित्रीय प्रस्तुतीकरण है। यह संपूर्ण उद्योग का पूर्ति वक्र होता है। इसे निम्न रेखा चित्र से स्पष्ट किया जा सकता है-

रेखाचित्र में दो फ़र्मों A और B के व्यक्तिगत पूर्ति वक्र को प्रकट किया गया है तथा इन दोनों का योग बाजार पूर्ति वक्र होता है। बाजार पूर्ति वक्र बाजार में किसी एक वस्तु का उत्पादन करने वाले सभी फ़र्मों के पूर्ति वक्रों का समस्तरीय जोड़ होता है।

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पूर्ति फलन या पूर्ति के निर्धारक तत्व(Supply function or Determinants of Supply)

पूर्ति फलन, किसी वस्तु की पूर्ति तथा उसके निर्धारक तत्वों के मध्य गणितीय संबंध को प्रकट करता है। इससे प्रकट होता है कि किसी वस्तु की पूर्ति, मुख्य रूप से फर्म के उद्देश्य, वस्तु की कीमत, फर्मों की संख्या, उत्पादन के साधनों की कीमतों, तकनीक की स्थिति तथा संभावित कीमतों आदि कई तत्वों पर निर्भर करती है। पूर्ति फलन को निम्न समीकरण के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है-

Sx = f (Px, Po, Nf, G, Pf, T, Ex, Gp)

(यहाँ Sx =वस्तु x की पूर्ति, Px= वस्तु x की अपनी कीमत, Po=अन्य वस्तुओं की कीमत, Nf= फ़र्मों की संख्या, G= फ़र्मों का उद्देश्य, Pf=उत्पादन के साधनों की कीमत, T=तकनीक, Ex=भविष्य में कीमत संभावना,  Gp=सरकारी नीति)

पूर्ति फलन या पूर्ति के निर्धारक तत्व

  1. वस्तु की अपनी कीमत-(Own price of the commodity)

किसी वस्तु की अपनी कीमत और उसकी पूर्ति में प्रत्यक्ष संबंध होता है। सामान्यतः किसी वस्तु की अपनी कीमत बढ़ने से उसकी पूर्ति बढ़ती है और कीमत कम होने से पूर्ति भी कम होती है।

  1. अन्य सभी वस्तुओं की कीमतें (Price of all other goods)

किसी वस्तु की पूर्ति अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी निर्भर करती है। अन्य वस्तुओं की कीमत में वृद्धि के फलस्वरूप वे वस्तुएं फ़र्मों के लिए लाभदायक हो जाएंगी। इस कारण से फ़र्में उनकी अधिक पूर्ति करेंगी। इसके विपरीत अन्य वस्तुओं की कीमत कम होने से कम लाभदायक होने की दशा में फ़र्में कम पूर्ति करेंगी।

  1. फर्मों की संख्या (Number of firms)

किसी वस्तु की बाजार पूर्ति फ़र्मों की संख्या पर भी निर्भर करती है। फ़र्मों की संख्या अधिक होने पर पूर्ति अधिक और फ़र्मों की संख्या कम होने पर पूर्ति भी कम होती है।

  1. फ़र्म के उद्देश्य (Goals of the firms)

यदि फर्म का उद्देश्य लाभ अधिकतम करना है तो बाजार में उस वस्तु की पूर्ति कम होती है। इसके विपरीत यदि फ़र्म का उद्देश्य बिक्री अधिकतम करना हो तो कम कीमत पर भी अधिक पूर्ति की जाएगी।

  1. उत्पादन के साधनों की कीमत Price of the factors of production)

उत्पादन के साधनों की कीमत बढ़ जाने से उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इसके फलस्वरूप पूर्ति में कमी होती है। इसके विपरीत उत्पादन के साधनों की कीमत कम होने पर उत्पादन की लागत कम होने से उस वस्तु की पूर्ति में वृद्धि होती है।

  1. तकनीक में परिवर्तन (change in technology)

उत्पादन की तकनीक में परिवर्तन होने का भी किसी वस्तु की पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है। उत्पादन की तकनीक में सुधार होने की दशा में प्रति इकाई उत्पादन लागत में कमी आती है। इसके फलस्वरूप पूर्ति में वृद्धि होती है।

  1. भविष्य में संभावित कीमत (Expected future price)

भविष्य में वस्तु की कीमतों में होने वाले परिवर्तन की संभावना का वर्तमान पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है। यदि भविष्य में कीमत बढ़ने की संभावना हो तो वर्तमान में पूर्ति घाट जाती है।  इसके विपरीत यदि भविष्य में कीमतों में कमी की संभावना हो तो वर्तमान पूर्ति बढ़ जाती है।

  1. सरकारी नीति (Government policy)

सरकार की कर तथा अनुदान संबंधी नीतियों का भी वस्तु की बाजार पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है। अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि होने पर सामान्यतः पूर्ति मे कमी होती है। इसके विपरीत अनुदानों के कारण पूर्ति में वृद्धि होती है।

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पूर्ति का नियम (Law of Supply)

पूर्ति के नियम के अनुसार, अन्य बातें समान रहने पर वस्तु की अपनी कीमत बढ़ने पर पूर्ति बढ़ जाती है तथा अपनी कीमत कम होने पर पूर्ति भी कम हो जाती है।

डूले के अनुसार, पूर्ति का नियम यह बतलाता है कि अन्य बातें समान रहने पर जितनी कीमत अधिक होती है उतनी ही पूर्ति अधिक होती है या जितनी कीमत कम होती है उतनी ही पूर्ति कम होती है।

पूर्ति के नियम की मान्यताएं (Assumptions of the law of supply)

पूर्ति के नियम की मुख्य मान्यताएं निम्नलिखित हैं-

  1. उत्पादन के कारकों की पूर्ति तथा कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  2. उत्पादन की तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  3. फ़र्म के उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  4. अन्य वस्तुओं की कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  5. भविष्य में वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने की संभावना नहीं होती।

पूर्ति के नियम के अपवाद (Exceptions to the law of demand)

  • प्राकृतिक तत्व पर आधारित कृषि उत्पाद वस्तुओं पर यह नियम दृढ़ता से लागू नहीं होता। गेहूं की कीमत बढ़ने पर भी उसकी पूर्ति कम रह सकती है यदि प्राकृतिक प्रकोप के कारण गेहूं का उत्पादन ही सीमित हुआ हो।
  • कुछ सामाजिक प्रतिष्ठा की वस्तुओं की अधिक कीमत मिलने पर भी उनके सीमित मात्रा में ही पूर्ति की जाती है। उदाहरण के लिए महंगी कार,  हीरे-जवाहरात आदि।
  • नाशवान वस्तुओं जैसे फल-सब्जी, दूध आदि की कीमतें कम होने पर भी विक्रेता उनकी अधिक से अधिक मात्रा बेचने का प्रयत्न करते हैं।

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पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन तथा पूर्ति में परिवर्तन (Extension and contraction of supply or change in quantity supplied)

अन्य बातें समान रहने पर पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन से अभिप्राय किसी वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि या कमी के फलस्वरूप उस वस्तु की मात्रा में वृद्धि या कमी से है। इसे पूर्ति वक्र पर संचलन के रूप में व्यक्त किया जाता है।

इसके विपरीत पूर्ति में परिवर्तन से अभिप्राय वस्तुओं की अपनी कीमत के अतिरिक्त पूर्ति के अन्य निर्धारित तत्वों में परिवर्तन के कारण पूर्ति की मात्रा में होने वाली कमी या वृद्धि से है। इसे पूर्ति वक्र में के खिसकाव के रूप में व्यक्त किया जाता है- आगे की ओर खिसकाव या पीछे की ओर खिसकाव।

पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन (Change in quantity supplied)

जब वस्तु की अपनी कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप इसकी पूर्ति में परिवर्तन होता है तो उसे पूर्ति वक्र पर विभिन्न बिंदुओं के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसे पूर्ति वक्र पर संचलन या पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन कहा जाता है। वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि के फलस्वरुप पूर्ति की मात्रा में वृद्धि होना पूर्ति का विस्तार (Extension of supply) कहलाता है और वस्तु की अपनी कीमत में कमी के फलस्वरूप पूर्ति की मात्रा में कमी होना पूर्ति का संकुचन (Contraction of supply) कहलाता है।

पूर्ति में परिवर्तन (Change in supply)

इस स्थिति में नया पूर्ति वक्र प्रारम्भिक पूर्ति वक्र के बाई ओर ऊपर या दाई ओर नीचे खिसक जाता है।  पूर्ति वक्र का यह खिसकाव किसी वस्तु की अपनी कीमत में स्थिर रहने पर उसकी पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य तत्व जैसे तकनीक में परिवर्तन इत्यादि के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। यह परिवर्तन पूर्ति के स्तर में परिवर्तन कहलाता है। इसके फलस्वरूप पूर्ति वक्र बायीं या दाईं ओर खिसक जाता है। इस प्रकार के परिवर्तनों को पूर्ति में वृद्धि या कमी पूर्ति में कमी कहा जाता है यह कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्वों में परिवर्तन के कारण होता है।

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पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन(Change in quantity supplied)

पूर्ति की मात्र में परिवर्तन को दो बिंदुओं में बाँटा जाता है- 1) पूर्ति का विस्तार तथा 2) पूर्ति का संकुचन

1- पूर्ति का विस्तार (Extension of supply)

अन्य बातें समान रहने पर, जब किसी वस्तु की अपनी कीमत बढ़ने के फलस्वरूप उसकी पूर्ति अधिक हो जाती है तो इस बढ़ी हुई पूर्ति को पूर्ति का विस्तार कहा जाता है। इसे निम्न तालिका और रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

कीमतपूर्ति की मात्राव्याख्या
11कीमत में वृद्धि
55पूर्ति की मात्रा का विस्तार

तालिका से ज्ञात होता है कि जब आइसक्रीम की कीमत ₹1 है तो एक आइसक्रीम की पूर्ति की जाती है।  कीमत बढ़कर ₹5 हो जाने पर पूर्ति का विस्तार 5 इकाई हो जाता है।

रेखाचित्र में आइसक्रीम की कीमत ₹1 तथा उसकी पूर्ति एक इकाई को बिंदु A द्वारा दर्शाया गया है जब आइसक्रीम की कीमत बढ़ कर ₹5 हो जाती है तो उसकी पूर्ति का विस्तार 5 इकाई हो जाता है। इसे बिंदु B से दर्शाया गया है। उत्पादक पूर्ति वक्र के A बिंदु से B बिंदु पर पहुंच जाता है। अतः एक पूर्ति वक्र के नीचे बिंदु से ऊंचे बिंदु पर पहुंचना पूर्ति का विस्तार कहलाता है।

2- पूर्ति का संकुचन (Contraction of Supply)

अन्य बातें समान रहने पर, जब किसी वस्तु की अपनी कीमत के कम होने के फलस्वरूप उसकी पूर्ति कम हो जाती है तो पूर्ति में होने वाले इस कमी को पूर्ति का संकुचन कहा जाता है। इसे निम्न तालिका और रेखाचित्र की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है-

कीमतपूर्ति की मात्राव्याख्या
55कीमत में कमी
11पूर्ति की मात्रा का संकुचन

तालिका से ज्ञात होता है कि जब आइसक्रीम की कीमत ₹5 है तो आइसक्रीम की पूर्ति 5 इकाई होती है। आइसक्रीम की कीमत के कम होकर ₹1 हो जाने पर आइसक्रीम की पूर्ति का संकुचन होकर एक इकाई हो जाता है। रेखाचित्र में आइसक्रीम की प्रारंभिक कीमत ₹5 और प्रारंभिक पूर्ति 5 को बिंदु ए द्वारा प्रकट किया गया है। आइसक्रीम की कीमत के कम होकर ₹1 हो जाने पर उसकी पूर्ति का भी संकुचन होकर एक इकाई हो जाता है उत्पादक पूर्ति वक्र के एक बिंदु से बिंदु पर पहुंच जाता है। अतः एक पूर्ति वक्र के ऊंचे बिंदु से नीचे बिंदु पर पहुंचना पूर्ति के संकुचन को प्रकट करता है।

ज्यादा कीमत होने पर किसी वस्तु की अधिक पूर्ति क्यों होती है? (Why more quantity is offered at higher price)

ऊंची कीमत पर किसी वस्तु की अधिक पूर्ति के दो कारण होते हैं-

  • अन्य बातें समान रहने पर ऊंची कीमत का अर्थ है उसका लाभ। इस वजह से उत्पादन अधिक उत्पादन करने तथा अधिक मात्रा बेचने के लिए प्रोत्साहित होता है।
  • अधिक उत्पादन प्राय घटते प्रतिफल के नियम के अंतर्गत किया जाता है जिसका अर्थ है उत्पादन के बढ़ने पर सीमांत लागत का बढ़ना है वजह से कीमत भी बढ़ेगी यदि अधिक पूर्ति के लिए उत्पादन को बढ़ाया जाता है

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पूर्ति में वृद्धि तथा पूर्ति में कमी अथवा पूर्ति में परिवर्तन (Increase in supply and decrease in supply or Change in supply)

जब किसी वस्तु की अपनी कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्व जैसे भविष्य की संभावनाएं, तकनीक या फर्म के लक्ष्य में परिवर्तन होने के कारण उसकी पूर्ति में परिवर्तन होता है तो उसे पूर्ति की वृद्धि या कमी कहते हैं। पूर्ति में वृद्धि या कमी पूर्ति वक्र के नीचे की ओर या ऊपर की ओर खिसकाव द्वारा प्रकट की जाती है।

1- पूर्ति में वृद्धि (Increase in Supply)

वस्तु की अपनी कीमत के समान रहने पर यदि किसी वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है अथवा कीमत कम होने पर पूर्ति समान रहती है तो इसे पूर्ति में वृद्धि कहा जाता है। अतएव पूर्ति में वृद्धि दो प्रकार के हो सकते हैं-

  1. समान कीमत अधिक पूर्ति
  2. कम कीमत पर समान पूर्ति

समान कीमत अधिक पूर्ति और कम कीमत पर समान पूर्ति

इसे हम निम्न तालिका से समझा सकते हैं-

आइसक्रीम की कीमतपूर्ति की इकाइयाँ
समान कीमतअधिक पूर्ति
33
34
कम कीमतसमान पूर्ति
33
23
पूर्ति में वृद्धि के कारण (Causes of increase in Supply)
  1. जब तकनीक में प्रगति होती है।
  2. जब उत्पादन के साधनों की कीमतों में कमी के कारण उत्पादन की लागत में कमी होती है।
  3. जब प्रतियोगी वस्तुओं की कीमतों में कमी होती है।
  4. जब बाजार में फ़र्मों की संख्या में वृद्धि होती है।
  5. जब फ़र्मों को भविष्य में कीमतों के कम होने की संभावना होती है।
  6. जब फर्म का उद्देश्य लाभ को अधिकतम करने के स्थान पर बिक्री को अधिकतम करना होता है।
  7. अनुदानों में वृद्धि या करो में कमी।

पूर्ति में कमी (Decrease in Supply)

किसी वस्तु की अपनी कीमत समान रहने पर यदि किसी वस्तु की पूर्ति कम हो जाती है अथवा अपनी कीमत बढ़ने पर भी पूर्ति समान रहती है तो इसे पूर्ति में कमी कहा जाता है। पूर्ति में वृद्धि की तरह आपूर्ति में कमी भी दो प्रकार की होती है-

  • समान कीमत कम पूर्ति
  • अधिक कीमत समान पूर्ति

इसे हम निम्न तालिका और रेखा चित्र द्वारा समझा सकते हैं

समान कीमत कम पूर्ति और अधिक कीमत पर समान पूर्ति

इसे हम निम्न तालिका से समझा सकते हैं-

आइसक्रीम की कीमतपूर्ति की इकाइयाँ
समान कीमतकम पूर्ति
33
3
अधिक कीमतसमान पूर्ति
33
43

पूर्ति में कमी के कारण- (Causes of decrease in Supply)

  1. जब तक तकनीक के पुराने पड़ जाने के कारण उत्पादन की लागत में वृद्धि हो जाती है।
  2. जब उत्पादन के कारकों की कीमत में वृद्धि के फलस्वरूप उत्पादन लागत में वृद्धि होती है।
  3. जब प्रतियोगी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो जाती है।
  4. जब बाजार में फर्मो की संख्या में कमी हो जाती है।
  5. जब फर्म निकट भविष्य में कीमतों के बढ़ने की संभावना का अनुमान लगाती हैं।
  6. जब फर्म का उद्देश्य बिक्री को अधिकतम करने के स्थान पर लाभ को अधिकतम करना होता है।
  7. अनुदानों में कमी या करो में वृद्धि।

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पूर्ति वक्र का खिसकाव (Shift in supply curve)

पूर्ति में कमी या वृद्धि से पूर्ति वक्र में खिसकाव होता है। पूर्ति वक्र का दाएं ओर खिसकाव पूर्ति में वृद्धि को प्रकट करता है। इसके विपरीत पूर्ति वक्र का बायीं ओर खिसकाव पूर्ति वक्र में कमी को प्रकट करता है।

इसे हम निम्न रेखाचित्र से स्पष्ट कर सकते हैं-

तकनीक में परिवर्तन का पूर्ति वक्र पर प्रभाव (Effect of change in technology on supply curve)

प्रौद्योगिकी या तकनीक में सुधार होने से उत्पादन के समान तथा औसत लागत घटती है, क्योंकि पहले से कम साधन लगाकर अधिक मात्रा में उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। अतः उत्पादक प्रचलित कीमत पर अधिक पूर्ति करने के लिए तैयार हो जाएंगे। फलस्वरूप पूर्ति वक्र आगे को दाईं ओर खिसक जाता है यह पूर्ति की वृद्धि की स्थिति को प्रकट करता है इसे हम निम्न रेखाचित्र से समझा सकते हैं-

आगतों की कीमतों में परिवर्तन का पूर्ति वक्र पर प्रभाव (Effect of change in input price on supply curve)

आगतो या साधनों की कीमतों में वृद्धि अथवा कमी हो सकती है।  आगतो की कीमतों में वृद्धि के फलस्वरुप सीमांत तथा औसत लागत बढ़ती है। अतः उत्पादक प्रचलित कीमत पर कम पूर्ति करते हैं। पूर्ति वक्र पीछे की ओर बाई ओर खिसक जाता है। यह पूर्ति में कमी को प्रकट करता है। इसके विपरीत यदि आगतों की कीमत गिर जाती है तो सीमांत तथा औसत लागत घट जाती है।  परिणामस्वरूप उत्पादक प्रचलित कीमत पर अधिक पूर्ति करने के योग्य हो जाता है। इस स्थिति में पूर्ति वक्र आगे की ओर दायीं ओर खिसक जाता है अर्थात पूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इसे  निम्न  रेखाचित्र से स्पष्ट किया जा सकता है-

उत्पादन कर में परिवर्तन का पूर्ति वक्र पर प्रभाव (Excise tax and supply curve)

उत्पादन कर वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन पर लगाया जाता है। सामान्यत: यह फर्म के उत्पादन की प्रति इकाई पर लगाया जाता है। इसके फलस्वरूप उत्पादक की सीमांत तथा औसत लागत बढ़ जाती है। यदि उत्पादन करों में वृद्धि होती है तो एक उत्पादक प्रचलित कीमत पर कम पूर्ति करेगा या वस्तु की पहले जितनी मात्रा को ऊंची कीमत पर बेचना चाहेगा। ऐसी स्थिति में पूर्ति में कमी होती है। इसके विपरीत उत्पादन करो में कमी से उत्पादक की सीमांत तथा औसत लागत घट जाती है।  फलस्वरुप उत्पादक उसी कीमत पर अधिक पूर्ति करने के योग्य हो जाता है अतः इस से पूर्ति में वृद्धि होती है। इसे निम्न रेखा चित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

संबंधित वस्तुओं की कीमत में परिवर्तन का पूर्ति वक्र पर प्रभाव Price of related goods and supply curve)

प्रतिस्थापन वस्तुओं की कीमत में परिवर्तन का वस्तु की पूर्ति पर विशेष प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि चाय के दाम बढ़ जाते हैं तो कॉफी के उत्पादक अपने स्टॉक को रोक लेंगे और कॉफी की कीमत में वृद्धि की प्रतीक्षा करेंगे। कॉफी की प्रचलित कीमत पर वह इसकी कम मात्रा बेचेंगे इसके फलस्वरूप पूर्ति घट जाएगी और पूर्ति वक्र पीछे की ओर खिसक जाता है। इसके विपरीत चाय की कीमत घट जाने पर उत्पादक अपने स्टाफ को जल्दी से जल्दी बेचना चाहेंगे अन्यथा क्रेता कॉफी की अपेक्षा चाय की मांग करने लगेंगे।  अतः प्रचलित कीमत पर कॉफी के अधिक मात्रा को बिक्री के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। इसके फलस्वरूप पूर्ति बढ़ जाएगी और पूर्ति वक्र आगे की ओर खिसक जाता है इसे निम्न रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

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समय तत्व और पूर्ति का व्यवहार (time period and supply behaviour)

अर्थशास्त्रियों ने समय अवधि को 3 प्रकारों में बांटा है-

अति अल्पकाल (Very Short Period/Market Period)

अति अल्पकाल जिसे बाजार अवधि या बाजार काल भी कहा जाता है। अति अल्प काल या बाजार अवधि समय की उस अवधि को कहते हैं जिसमें किसी भी तरह उत्पादन में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। अतः पूर्ति को अधिक से अधिक उसके वर्तमान स्टॉक तक ही बढ़ाया जा सकता है।

उदाहरण के लिए एक मुर्गी-फार्म में अति अल्पकाल में अंडों की पूर्ति उतनी ही होती हैं जितने अंडे स्टॉक में होते हैं।  किसान के लाख निवेदन करने पर भी मुर्गियां अधिक अंडे नहीं देंगी। वास्तव में नाशवान वस्तुएं जैसे हरी सब्जियां, दूध की अति अल्प काल में पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार रहती है।  इसे एक खड़ी रेखा द्वारा पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति के रूप में प्रकट किया जा सकता है।

अल्पकाल (Short Period)

अल्पकाल समय की उस अवधि को कहते हैं जिसमें घटते-बढ़ते परिवर्तनशील साधनों के अधिक उपयोग द्वारा पूर्ति में वृद्धि की जा सकती है। इस अवधि में स्थिर साधनों जैसे प्लांट मशीनरी इत्यादि में परिवर्तन नहीं किया जा सकता।  अतः बंधे साधनों की स्थिति के कारण पूर्ति को केवल एक सीमा तक ही कीमतों में परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित किया जा सकता है। सरल शब्दों में अल्पकाल में पूर्ति को वर्तमान उत्पादन क्षमता तक ही बढ़ाया जा सकता है।

दीर्घकाल (Long Run)

दीर्घकाल समय की उस अवधि को कहते हैं जिसमें उत्पादन के सभी साधनों में परिवर्तन किया जा सकता है। तकनीक सुधार भी इसी अवधि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः पूर्ति वक्र मांग वक्र के अनुसार परिवर्तित हो सकता है। सरल शब्दों में दीर्घकाल समय कि वह अवधि है जिसमें पूर्ति को मांग के अनुसार,उत्पादन कारकों में परिवर्तन करके घटाया बढ़ाया जा सकता है।

दीर्घकाल में पूर्ति वक्र अल्पकाल की तुलना में कीमत के परिवर्तन के प्रति बहुत संवेदनशील होती है। अल्पकाल की तुलना में पूर्ति वक्र में खिसकाव की बहुत अधिक प्रवृत्ति पाई जाती है। दीर्घकाल पूर्ति वक्र की तुलना में अल्पकाल पूर्ति वक्र बहुत अधिक खड़ी ढाल वाले वक्र होती है। अतः कहा जा सकता है कि दीर्घकालीन पूर्ति वक्र, अल्पकालीन पूर्ति वक्र की तुलना में अधिक चपटी वक्र है।

पूर्ति की कीमत लोच (Price Elasticity of Supply)

पूर्ति की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरुप उसकी पूर्ति में होने वाले परिवर्तन का माप है। पूर्ति का नियम हमें यह बताता है कि कीमत में परिवर्तन होने के कारण पूर्ति में किस दिशा में परिवर्तन होगा अर्थात कीमत के घटने या बढ़ने से पूर्ति घटेगी या बढ़ेगी। परंतु यदि हम यह जानना चाहे की कीमत में 10% बढ़ने पर पूर्ति कितने प्रतिशत बढ़ेगी अर्थात पूर्ति में परिवर्तन किस अनुपात में होगा तो यह हमें पूर्ति की कीमत लोच से ज्ञात होगा। अतएव पूर्ति की कीमत लोच, कीमत में अनुपातिक परिवर्तन के फलस्वरुप पूर्ति में होने वाले अनुपातिक परिवर्तन का माप है।

सैमुअल्सन के अनुसार, पूर्ति की लोच कीमत में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरुप पूर्ति में होने वाले परिवर्तन की प्रतिक्रिया की मात्रा है।

प्रो. बिलास के अनुसार, “पूर्ति की लोच अभिप्राय वस्तु की पूर्ति में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन को कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन से भाग देने से है।”

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पूर्ति की कीमत लोच का माप (Measurement of Price Elasticity of Suppy)

पूर्ति की कीमत लोच (संक्षेप में पूर्ति की लोच) मापने के दो प्रमुख विधियां निम्न प्रकार से है-

  1. आनुपातिक या प्रतिशत विधि
  2. ज्यामितीय विधि

1) आनुपातिक या प्रतिशत विधि (Proportionate or percentage method)

इस विधि के अनुसार पूर्ति की लोच वस्तु की पूर्ति की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन तथा कीमत में प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है।

पूर्ति की लोच (Es)=पूर्ति की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन/कीमत में प्रतिशत परिवर्तन

उपरोक्त सूत्र को निम्न प्रकार से भी लिखा जा सकता है-

E= (-)  P/Q ×  𐤃 Q/P𐤃

2) ज्यामितीय विधि (Geometric method)

इस विधि के अनुसार पूर्ति की लोच पूर्ति वक्र के उद्गम पर निर्भर करती है। यह मान्यता लेते हुए की पूर्ति वक्र सीधी और धनात्मक ढलान वाले होते हैं, हम पूर्ति की लोच की 5 संभव स्थितियों की कल्पना कर सकते हैं जो कि निम्नलिखित होती हैं-

1-पूर्ति की लोच इकाई के बराबर (Unitary Elasticity of supply)

जब किसी वस्तु की पूर्ति में परिवर्तन उसी अनुपात में होता है जिस अनुपात में उसकी कीमत में परिवर्तन होता है तो उसे पूर्ति की इकाई लोच कहा जाता है। उदाहरण के लिए यदि कीमत में 20% की वृद्धि होने से उसकी पूर्ति में भी 20% परिवर्तन हो जाए तो पूर्ति की लोच इकाई के बराबर होगी। इस स्थिति में पूर्ति वक्र मूल बिंदु (O) से 45 डिग्री का कोण बनाता है।

2- इकाई से अधिक लोचदार पूर्ति (Greater than unitary elasticity of supply or elastic supply)

इकाई से अधिक लोचदार पूर्ति उस समय होती है जब कीमत में जितना परिवर्तन हो पूर्ति में उससे ज्यादा परिवर्तन होता है। उदाहरण के लिए कीमत में 20% की वृद्धि होने से पूर्ति में 30% की वृद्धि हो जाए तो यह इकाई से अधिक लोचदार पूर्ति दर्शाता है।  इस स्थिति में पूर्ति वक्र OY अक्ष पर किसी बिंदु से शुरू होता है।

3- इकाई से कम लोचदार/बेलोचदार पूर्ति (Less than unitary elasticity of supply or inelastic supply)

जब कीमत में परिवर्तन के अनुपात में पूर्ति में कम परिवर्तन होता है तो इसे इकाई से कम या बेलोचदार पूर्ति की स्थिति कहा जाता है। उदाहरण के लिए कीमत में 20% की वृद्धि होने पर पूर्ति में केवल 15% की वृद्धि हो तो इसे इकाई से कम लोचदार पूर्ति कहा जाएगा। इस स्थिति में पूर्ति वक्र OX अक्ष पर किसी बिन्दु से शुरू होता है।

4- पूर्ति की लोच का शून्य होना (Zero elasticity of supply)

इस स्थिति में पूर्ति वक्र को एक ऊर्ध्वाधर रेखा द्वारा दिखाया जाता है। प्राय: कृषि पदार्थों की पूर्ति की लोच शून्य होती है। क्योंकि कृषि पदार्थों की पूर्ति को कीमत के अनुसार घटाया बढ़ाया नहीं जा सकता है। इस स्थिति में पूर्ति वक्र OY अक्ष के समानांतर होता है।

5-पूर्ति की लोच का अनंत होना (Infinite elasticity of supply)

इस स्थिति में पूर्ति वक्र को OX अक्ष के समानांतर होता है। सामान्यतः पूर्ण प्रतियोगिता बाजार में पूर्ति वक्र इस प्रकार का होता है।

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पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले तत्व (Factors affecting Elasticity of Supply)

  1. आगतों की प्रकृति (Nature of inputs)

यदि किसी वस्तु के उत्पादन के लिए आवश्यक आगत (कच्चा माल) सामान्य रूप से उपलब्ध होते हैं तो उस वस्तु की पूर्ति लोचदार होती है। इसके विपरीत यदि किसी वस्तु के उत्पादन के लिए विशेष आगतों की आवश्यकता होती है तो उसकी पूर्ति बेलोचदार होती है।

  1. प्राकृतिक बाधाएं (Natural Constraint)

किसी वस्तु की पूर्ति पर प्राकृतिक बाधाओं का भी प्रभाव पड़ता है। प्रकृति से प्राप्त आगतों पर प्राकृतिक प्रतिबंध होते है। उदाहरण के लिए इमारती लकड़ी के पेड़ तैयार होने में कई वर्ष का समय लगने के कारण उसकी पूर्ति में वृद्धि आसानी से नहीं की जा सकती है।

  1. जोखिम सहन करना (Risk Taking approach)

यदि किसी वस्तु का उत्पादक जोखिम उठाने का इच्छुक है तो पूर्ति लोचदार होती है। इसके विपरीत जोखिम न उठाने की दशा में पूर्ति बेलोचदार होती है।

  1. वस्तु की प्रकृति (Nature of Commodity)

नाशवान वस्तुओं जैसे दूध, हरी सब्जियाँ आदि की पूर्ति बेलोचदार होती है। क्योंकि कीमत में परिवर्तन होने पर भी उनकी पूर्ति को कम या ज्यादा नहीं किया जा सकता है। इसके विपरीत टिकाऊ वस्तुओं की पूर्ति लोचदार होती है क्योंकि कीमत में परिवर्तन होने पर उनकी पूर्ति को आवश्यकतानुसार कम या अधिक किया जा सकता है।

  1. उत्पादन लागत (Cost of Production)

यदि उत्पादन में बढ़ती लागतों का नियम लागू हो रहा होता है तो वस्तु की पूर्ति बेलोचदार होती है।

  1. समय तत्व (Time Element)

पूर्ति की लोच पर समय तत्व का बहुत प्रभाव पड़ता है। अति अल्पकाल में पूर्ति में कोई परिवर्तन करना संभव नहीं होता, अतः पूर्ति की लोच बेलोचदार होती है। अल्पकाल में उत्पादन को कुछ सीमा तक ही परिवर्तित किया जा सकता है, अतः पूर्ति कम लोचदार होती है। इसके विपरीत दीर्घकाल में उत्पादन के सभी कारक परिवर्तनशील होने के कारण पूर्ति अधिक लोचदार होती है।

  1. उत्पादन की तकनीक (Technique of production)

यदि किसी वस्तु के उत्पादन की तकनीक जटिल और पूँजी प्रधान होती है तो उस वस्तु की पूर्ति कम लोचदार या बेलोचदार होती है। इसके विपरीत उत्पादन तकनीक सरल है तो पूर्ति अधिक लोचदार होती है।

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पूर्ति की लोच का महत्व (Importance of Elasticity of Supply)

  1. कीमत निर्धारण तथा पूर्ति की लोच (Price determination and elasticity of supply)

मार्शल द्वारा प्रतिपादित समय तत्व की धारणा वास्तव में पूर्ति की लोच पर आधारित है। अति अल्प काल में पूर्ति के अधिक बेलोचदार होने के फलस्वरूप कीमत निर्धारण पर मांग का अधिक प्रभाव पड़ता है। दीर्घकाल में पूर्ति का अधिक लोचदार होने के फलस्वरूप कीमत पर पूर्ति का अधिक प्रभाव पड़ता है।

2) साधन कीमत निर्धारण तथा पूर्ति की लोच (Factor pricing and elasticity of supply)

लगान के आधुनिक सिद्धांत के अनुसार एक साधन को लगान उस समय प्राप्त होता है जब उसकी पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होती है। इसलिए भूमि से प्राप्त सारी आय को लगान कहा जाता है। जबकि उत्पादन के अन्य साधनों जैसे श्रम, पूंजी आदि की पूर्ति अल्पकाल के लिए बेलोचदार होती है तो इन साधनों की मांग बढ़ने पर इन्हें अपनी परिवर्तनशील लागत से जो अधिक आय प्राप्त होती है, वह लगान का ही एक रूप होती है। इसे अर्ध-लगान (Quasi Rent) कहा जाता है। जब किसी साधन की पूर्ति पूर्णतया लोचदार होती है तो उसे लगान के रूप में कोई अतिरिक्त आय नहीं प्राप्त होती है।

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